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जब इंदिरा गांधी ने नाश्ते में मांगा था पपीता, शेफ के हाथ-पांव फूले, गोवा की गलियों की छाननी पड़ी थी खाक

नई दिल्ली : पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सुबह के नाश्ते में पपीता परोसे जाने की इच्छा जताने पर शेफ के हाथ पांव फूल गए थे। शेफ को पपीते का प्रबंध करने के लिए पांच सितारा होटल से निकलकर गोवा की गलियों की खाक छाननी पड़ी थी।

शेफ सतीश अरोड़ा ने अपनी पुस्तक स्वीट्स एंड बिटर्स : टेल्स फ्राम ए शेफ्स लाइफ में पुरानी यादों को ताजा करते हुए लिखा है कि 1983 में इंदिरा गांधी गोवा में आयोजित राष्ट्रमंडल प्रमुखों की बैठक की अध्यक्षता करने पहुंचीं। उन्होंने सुबह के नाश्ते में पपीता खाने की इच्छा जाहिर की थी। इसके बाद होटल ताज के लिए इसका इंतजाम करना एक चुनौती बन गया था।

अरोड़ा लिखते हैं कि उस समय उन्हें और उनकी टीम के लिए इस स्थानीय फल की तलाश करना एक चुनौती जैसा बन गया था। यह 1983 का नवंबर माह था। तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी 48 घंटे के रिट्रीट के लिए 40 से अधिक देशों के प्रमुख नेताओं की मेजबानी कर रही थीं। इस बैठक को गोवा में आयोजित करने का उद्देश्य इसे विश्व पर्यटन मानचित्र पर लाना था।

अरोड़ा के अनुसार, कार्यक्रम को देखते हुए सड़कें चौड़ी की गईं, पुल बनाए गए, स्ट्रीट लाइटों को दुरुस्त करने के साथ ही हवाई अड्डे की मरम्मत की गई। इस पूरे कार्यक्रम के केंद्र में होटल ताज था, जो सौ से अधिक व्यंजन परोसने की तैयारी में जुटा था। ये सब गहमागहमी चल ही रही थीं कि इसी बीच सूचना आई कि इंदिरा गांधी हर दिन नाश्ते में पपीता परोसे जाने की इच्छुक हैं।

अरोड़ा ने अपनी पुस्तक में कहा है कि नवंबर में अच्छे पपीते की कमी को देखते हुए मैंने मुंबई से कच्चे पपीते लाने की व्यवस्था की। उनके पकने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए उन्हें कागज में लपेटा गया। नाश्ते में पपीता परोसा जाना था और पहले ही दिन पाया गया कि पपीते पिलपिले हो गए थे क्योंकि जिस आदमी को पपीतों को कागज में लपेटने की जिम्मेदारी दी गई थी, उसने उन्हें कुछ ज्यादा ही समय तक कागज में ही लिपटे छोड़ दिया।

इसी बीच, कर्मचारियों को बताया गया कि इंदिरा गांधी और उनके खास मेहमान नाश्ते के लिए आने वाले हैं। रसोई में घबराहट स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। शेफ कहते हैं कि मैं प्रधानमंत्री को ज्यादा पका हुआ पपीता परोस ही नहीं सकता था। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं।
इसके बाद पके पपीते की तलाश के लिए मुझे नजदीकी बाजार में ले जाने के लिए एक पुलिस जीप की व्यवस्था की गई। मेरी किस्मत अच्छी थी और मैंने एक दर्जन पपीते ले लिए। उस समय, मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई यौद्धा युद्ध जीतकर पुलिस जीप में लौट रहा हो और वह भी 12 पपीतों के साथ।

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