पिछौड़े में रची-बसी कुमाऊं की संस्कृति, आस्था और पहचान फैशन तक सीमित न रहे परंपरा, विरासत के रूप में इसका सम्मान करे नई पीढ़ी
नई पीढ़ी पिछौड़े को विरासत और पहचान के प्रतीक के रूप में जाने व समझे, शादी-विवाह, नामकरण, जनेऊ, पूजा-पाठ और दीपावली समेत विभिन्न संस्कारों में पिछौड़ा धारण करने की मान्यता

देहरादून: पिछौड़ा कुमाऊं की धरोहर, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है। इससे कुमाऊं की भावनाएं जुड़ी हैं। यह केवल एक पहनावा नहीं, बल्कि पहचान, आस्था, परंपरा और नारी सम्मान का प्रतीक भी है। पिछौड़े के मूल सांस्कृतिक महत्व, गरिमा और परंपरागत पहचान को समझने व सम्मान देने की जरूरत है।
गुरुवार को प्रेस क्लब सभागार में कूर्मांचल सांस्कृतिक कल्याण परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार ने कहा कि पिछौड़ा उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। विशेष शुभ अवसरों और धार्मिक संस्कारों के समय महिलाओं के पिछौड़ा धारण करने की मान्यता है। वर्तमान में लोकप्रियता के कारण महिलाएं इसे विवाह, सांस्कृतिक आयोजनों और अन्य समारोहों में भी पहन रही हैं।
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को पिछौड़े को केवल फैशन के रूप में नहीं, बल्कि अपनी विरासत और पहचान के प्रतीक के रूप में जानना और समझना चाहिए। इसके मूल सांस्कृतिक महत्व, गरिमा और परंपरागत पहचान को बनाए रखने की जरूरत है।
विशेष अवसरों पर पिछौड़ा धारण करने की परंपरा
परिषद की सांस्कृतिक सचिव बबीता साह लोहनी ने कहा कि होली के अवसर पर कुमाऊं में पिछौड़ा नहीं पहना जाता है। शादी-विवाह, नामकरण, जनेऊ, पूजा-पाठ, दीपावली, हरेला, शिव-अर्चन और अन्य अवसरों पर अधिकांश कुमाऊंनी महिलाएं पिछौड़ा धारण करती हैं। हालांकि, अब महिलाएं किसी भी आयोजन में पिछौड़ा पहन लेती हैं, जो उचित नहीं है।
उन्होंने महिलाओं से पिछौड़े को सम्मान देने की अपील करते हुए कहा कि यह हमारी अटूट संस्कृति का अभिन्न अंग है।
इस दौरान परिषद के महासचिव गोविंद पांडे, भारती पांडे, उमा कोठारी, शांति बिष्ट, कमला जोशी, मंजू देवपा, शोभा पांडेय, प्रेमा तिवारी, भगवती जोशी, हिमानी चौधरी और गिरीश चंद्र पांडे आदि मौजूद रहे।



